सुकमा में कैसे टूटी माओवाद की कमर? 37 साल, 373 शहीद और 388 गांव वालों का खून,

RAIPUR KI BAAT
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दक्षिण बस्तर में 37 साल पहले रामाराम गांव से शुरू हुआ माओवाद अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। 373 जवानों की शहादत और सैकड़ों ग्रामीणों के बलिदान के बाद सुकमा में शांति लौट रही है।

रायपुर: छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर यानी सुकमा में माओवाद का जो बीज 13 फरवरी 1989 की रात रामाराम गांव में बोया गया था, वह 37 साल बाद अब पूरी तरह सूख चुका है। आंध्रप्रदेश के रास्ते आए माओवादियों ने जब पूर्व विधायक हांदाराम और तत्कालीन सरपंच आपताराम के घर दबिश देकर 12 बोर और 315 बोर की लाइसेंसी बंदूकें लूटी थीं, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह इलाका आने वाले दशकों तक बारूद की गंध से महकता रहेगा। लेकिन आज, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की डेडलाइन के भीतर सुरक्षा बलों ने माओवाद की कमर तोड़ दी है।

37 साल का खूनी इतिहास

इन 37 सालों में बस्तर की धरती अपनों के ही खून से लाल हुई। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, इस लंबी लड़ाई में 373 जवानों ने अपनी कुर्बानी दी और 547 जवान घायल हुए। माओवादियों की क्रूरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 388 मासूम ग्रामीणों को भी मौत के घाट उतार दिया।

13-14 फरवरी 1989 रामाराम गांव में पहली लूट, गोलापल्ली थाने पर हमला माओवाद की पहली दस्तक

28 फरवरी 2006 दरबागुड़ा ब्लास्ट (25 ग्रामीणों की मौत) सल्वा जुडूम के खिलाफ उग्रता

06 अप्रैल 2010 ताड़मेटला हमला (76 जवान शहीद)         देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला

30 मार्च 2026 डीआरजी के साथ अंतिम मुठभेड़         माओवाद का लगभग खात्मा

वो जख्म जो कभी नहीं भरेंगे

माओवाद के इस काले इतिहास में कुछ ऐसी तारीखें हैं जिन्हें देश कभी नहीं भूल सकता। 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला में घात लगाकर किए गए हमले में 76 जवान शहीद हुए थे। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया था। इसी तरह बुरकापाल में साल 2017 में सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगे 26 जवानों की शहादत हुई थी। 2006 में दरबागुड़ा में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में 25 ग्रामीणों की मौत हो गई थी। इस विस्फोट से 25 फुट गहरा गड्ढा हो गया था।

अंतिम मुठभेड़ और शांति की दस्तक

माओवादियों और जवानों के बीच अंतिम बड़ी मुठभेड़ 30 मार्च 2026 को हुई, जिसमें एक माओवादी मारा गया। इसके तुरंत बाद अंतिम दो सक्रिय महिला माओवादियों (जिन पर 8-8 लाख का इनाम था) ने आत्मसमर्पण कर दिया। अब सुकमा के उन गांवों में भी मोबाइल की घंटियां बज रही हैं, जहां कभी गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी।

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