इस्लामाबाद: पाकिस्तान की दशकों से अफगान तालिबान के साथ करीबी दोस्ती रही है। 1990 के दशक की शुरुआत में तालिबान को खड़ा करने में पाकिस्तान ने ही मदद की थी। इसका मकसद भारत के साथ दुश्मनी में रणनीतिक बढ़त हासिल करना था। पाकिस्तान ने काफी हद तक इसमें सफलता भी पाई, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण 1999 का कंधार विमान अपहरण था। हालांकि, आज वही तालिबान पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन बना बैठा और भारत का दोस्त। आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान में तालिबान के ठिकानों पर हमला कर रहा है और भारत उनके साथ बातचीत। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पाकिस्तान की रणनीति में गड़बड़ कहां हुई।
तालिबान का हमदर्द रहा है पाकिस्तान
9/11 हमले के बाद जब अमेरिका ने अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की तलाश में अफगानिस्तान पर हमला किया, तब भी पाकिस्तान तालिबान का हमदर्द बना रहा। उसने एक तरफ अमेरिका के साथ आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के लिए हाथ मिलाया और मोटा माल कमाया और दूसरी ओर तालिबान के लगभग सभी वरिष्ठ नेताओं को शरण दी। खुद अमेरिका की टॉप सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व ने स्वीकारा कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान के दोहरे रवैये के कारण उसकी हार हुई। अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ सभी तरह से सैन्य संबंध तोड़ लिए और मदद रोक दी। इसके बावजूद पाकिस्तान, अफगान तालिबान का मददगार बना रहा।
तालिबान की वापसी का पाकिस्तान ने मनाया था जश्न
2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी और काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद सबसे ज्यादा जश्न पाकिस्तान ने मनाया गया। इस मौके पर तालिबान के प्रति समर्थन जताने के लिए तत्कालीन पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के चीफ लेफ्टिनेंट जनरल फैज हामिद खुद काबुल पहुंचे थे। तब पाकिस्तान सरकार और वहां की मीडिया ने बहुत जोश खरोश के साथ यह प्रचारित किया था कि काबुल पर तालिबान के कब्जे से अफगानिस्तान में भारतीय निवेश डूब गया और इसे नई दिल्ली की रणनीतिक हार बताया था। भारत ने भी हालात को देखते हुए काबुल में अपना दूतावास और दूसरे शहरों में स्थित वाणिज्य दूतावासों को बंद कर दिया था। लेकिन, तालिबान के साथ संबंध सुधरने के बाद इन्हें फिर से चालू किया गया।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान में ताजा संघर्ष
सोमवार रात को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर हवाई हमला किया था। अफगान तालिबान ने कहा कि एक नशा मुक्ति केंद्र पर हुए पाकिस्तानी हमले में कम से कम 400 लोग मारे गए और 250 घायल हुए। लेकिन, पाकिस्तान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि उसने "सैन्य ठिकानों और आतंकवादी समर्थन के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया था।" पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने पिछले महीने कहा था कि इन दो मुस्लिम पड़ोसी देशों के बीच बढ़ता तनाव "खुले युद्ध" जैसा हो गया है।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान में लड़ाई जारी
22 फरवरी को, पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में विद्रोही गुटों के ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। उसी महीने बाद में, पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के कई बड़े शहरों पर हवाई हमले किए। इन हवाई और जमीनी हमलों में सीमा के कई सेक्टरों में तालिबान की सैन्य चौकियों, मुख्यालयों और गोला-बारूद के भंडारों को निशाना बनाया गया। ये हमले तब हुए जब अफगानिस्तान पर काबिज तालिबान ने पाकिस्तानी सीमा बलों पर हमला किया था। इससे पहले, अक्टूबर में दोनों देशों के बीच सीमा पर हुई झड़पों में दर्जनों सैनिक मारे गए थे; बाद में तुर्की, कतर और सऊदी अरब की मध्यस्थता से हुई बातचीत के बाद दुश्मनी खत्म हुई और एक कमज़ोर-सा संघर्ष-विराम लागू किया गया।
पाकिस्तान-तालिबान अब एक-दूसरे के दुश्मन क्यों बन गए हैं?
2021 में तालिबान की वापसी के बाद पाकिस्तान में अचानक आतंकवादी हमलों में तेजी देखी गई। यह तेजी समय के साथ बढ़ती चली गई। पाकिस्तान का आरोप है कि चरमपंथी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का नेतृत्व और उसके कई लड़ाके अफगानिस्तान में मौजूद हैं और वहीं से हमले की साजिश रच रहे हैं। उसका यह भी आरोप है कि बलूचिस्तान की आजादी चाहने वाले हथियारबंद विद्रोही भी अफगानिस्तान को एक सुरक्षित पनाहगाह के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
आतंकवादी हमलों से बिलबिला रहा पाकिस्तान
एक वैश्विक निगरानी संस्था, 'आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा' के अनुसार, पाकिस्तान में 2022 के बाद से हर साल उग्रवाद बढ़ा है, और TTP तथा बलूच विद्रोहियों के हमले भी बढ़े हैं। काबुल ने अपनी तरफ से, बार-बार इस बात से इनकार किया है कि उसने चरमपंथियों को अफगान जमीन का इस्तेमाल करके पाकिस्तान पर हमले करने की इजाज़त दी है। वहीं, अफगान तालिबान का कहना है कि पाकिस्तान उसके दुश्मन, इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों को पनाह देता है।
