नरेन्द्र मोदी तब मुख्यमंत्री थे और आशा भोसले से पहली मुलाकात, ताई ने कर दी थी भविष्यवाणी- जबरदस्त जीत होगी

RAIPUR KI BAAT
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ये कहानी है मशहूर सिंगर आशा भोसले और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहली मुलाकात की। 'मोदी आर्काइव' ने इसी मुलाकात की कहानी शेयर की है और बताया है कि जब उन्होंने उन्हें फोन किया था तब नरेन्द्र मोदी एक मुख्यमंत्री थे और वो उनसे पहले कभी नहीं मिली थीं। वह उन्हें अपना छोटा भाई मानने लगीं। उन्होंने उस दिन नरेंद्र मोदी की तरफ देखा और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा था- जबरदस्त जीत होगी।

मशहूर सिंगर आशा भोसले के निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन, संघर्षों और यात्रा को समर्पित डिजिटल मंच 'मोदी आर्काइव' ने प्रधानमंत्री और आशा भोसले की मुलाकात की कहानी शेयर की है। इसमें दोनों के बीच हुए संवाद, व्यक्तिगत स्मृतियां और विभिन्न सार्वजनिक अवसरों का जिक्र किया गया है।

'मोदी आर्काइव' के सोशल मीडिया पोस्ट में बताया गया है कि कैसे आशा भोसले ने एक बार खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर सम्पर्क किया था, जिसमें उन्होंने गुजरात की जड़ों के बारे में बात की और अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं।

'मोदी आर्काइव' में शेयर किया गया है आशा भोसले का किस्सा

पोस्ट में कहा गया है, 'आशा भोसले की आवाज ने आजाद भारत के संगीत को एक पहचान दी थी। उन्होंने आठ दशकों में 12,000 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड किए थे। फिर भी उन्होंने एक ऐसे मुख्यमंत्री को फोन किया जिनसे वह कभी मिली नहीं थीं और उन्हें बताया कि उनकी मां गुजराती थीं। उन्होंने कहा कि गुजरात का विकास उनका फर्ज और जिम्मेदारी है। जब उन्होंने फोन रख दिया तो उनके एक दोस्त ने धीरे से कहा कि आशा बेन, हमारे मोदी भाई बहुत अच्छे इंसान हैं।'

नरेंद्र मोदी उनकी तरफ मुड़े और सीधे-सादे अंदाज में पूछा- दीदी, आप कैसी हैं?

पीएम मोदी और आशा भोसले की पहली मुलाकात के बारे में पोस्ट में लिखा है, 'उस पहली मुलाकात से वह बहुत प्रभावित हुईं। अभी और भी बहुत कुछ होना बाकी था। वे (नरेंद्र मोदी और आशा भोसले) 2013 में पुणे में दीनानाथ मंगेशकर सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के उद्घाटन के मौके पर आमने-सामने मिले। यह अस्पताल उनके पिता की याद में बनाया गया था, जिनका सही इलाज नहीं मिलने पर निधन हो चुका था। मंच पर अपनी सीट पर बैठने से पहले, नरेंद्र मोदी उनकी तरफ मुड़े और सीधे-सादे अंदाज में पूछा- दीदी, आप कैसी हैं? वह एक मुख्यमंत्री थे, और उनके आस-पास सरकारी कामकाज की सारी औपचारिकताएं थीं। फिर भी, उन्होंने सबसे पहले उन्हें दीदी कहकर पुकारा। उस दिन उन्होंने (पीएम मोदी) उनसे एक ऐसी बात कही जिसे वह कभी नहीं भूलीं।'

नरेंद्र मोदी की तरफ देखा और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा- जबरदस्त जीत होगी

'मोदी आर्काइव' के मुताबिक, जब वह जाने लगे तो उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, 'दीदी, मैं चलता हूं। फिर मिलेंगे।' उस दिन से, वह उन्हें अपना छोटा भाई मानने लगीं। उस दिन उनका दस साल का पोता भी पुणे में मौजूद था। यह जाने बिना कि मुख्यमंत्री के सामने बड़ी-बड़ी भविष्यवाणियां नहीं करनी चाहिए, उन्होंने नरेंद्र मोदी की तरफ देखा और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा- जबरदस्त जीत होगी।'

पीएम मोदी ने कहा- एक बार मैं किसी से मिल लेता हूं, तो उन्हें कभी नहीं भूलता

पीएम नरेंद्र मोदी ने उनकी बात सुनी और मुस्कुरा दिए। उस मुलाकात के बाद जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही और दस साल गुजर गए। एक और कार्यक्रम में, उनकी पोती प्रधानमंत्री के पास ही बैठी थी। उन्हें उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री उसके साथ विनम्र तो होंगे, लेकिन एक निश्चित दूरी बनाए रखेंगे। उन्होंने पूछा, 'क्या आपको मैं याद हूं?' उन्होंने तुरंत जवाब दिया, 'एक बार मैं किसी से मिल लेता हूं, तो उन्हें कभी नहीं भूलता।' फिर उन्होंने उसके भाई के बारे में पूछा।

आशा भोसले ने बताया कि उनकी पोती हैरान रह गई थी

पोस्ट में कहा गया है, 'आशा भोसले ने बताया कि उनकी पोती हैरान रह गई थी। प्रधानमंत्री, जो 1.4 अरब लोगों का नेतृत्व करते हैं, उन्हें एक दस साल का लड़का याद था जिससे वे दस साल पहले, बस एक बार, चलते-फिरते मिले थे। यह एक छोटी सी कहानी लग सकती है, लेकिन अगर आप इस पर सोचें, तो यह असल में एक बहुत बड़ी कहानी है।"

'गलती से घर में लड़की पैदा हो गई', आशा भोसले से बोलती थी मां, पड़ोसी कहते थे 'बुद्धू' और 'पहलवान'

'मैं फिल्म जगत की आखिरी मुगल हूं', सुरों की मल्लिका आशा दीदी ने जब यह कहा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि वह एक दिन संगीत की दुनिया को यूं दर्द भरे सन्नाटे में छोड़ जाएंगी। करीब दो साल पहले, 91 की उम्र में दुबई के लाइव कॉन्सर्ट में 'दम मारो दम' गाकर उन्होंने न सिर्फ दर्शकों को झुमाया, बल्कि विक्की कौशल के मशहूर 'तौबा तौबा' स्टेप से सभी को मंत्रमुग्ध भी कर दिया था।

आशाजी के हाथ की बनाई हुई वो चाय की प्याली

आठ दशकों से भी लंबे अरसे में जिसमें चार पीढ़िया जवान हो जाती हैं, में तकरीबन 12 हजार गाने गए वाली सुरों की मल्लिका से हमारी तीन -चार मुलाकातें रहीं और हर मुलाकात यादगार। पहली ही मुलाकात में उन्होंने चौंका दिया था। दरवाज़े की घंटी बजाने पर उन्होंने खुद दरवाजा खोला—सादी पीली साड़ी में एक बेहद सरल, घरेलू स्त्री। उनकी शहद-सी मीठी आवाज में 'आइए' सुनकर लगा, कोई इतना सच्चा, सरल, बिंदास और प्रतिभाशाली कैसे हो सकता है। उनके हाथ की चाय की मीठी चुस्कियों के साथ उन्होंने अपने जीवन के कड़वे पल भी साझा किए थे। आज उनकी विदाई पर वही चाय और वो बातें बार-बार याद आ रही हैं।
आशा भोसले ने कहा था, 'मेरी जिंदगी एक खुली किताब रही है। मैंने कभी खुद को परदे के पीछे नहीं रखा, न ही किसी तरह का भेदभाव किया, शायद यही वजह है कि लोग मुझे अपना मानते हैं।' आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं, तो यह कमी किसी अपने, बेहद करीबी को खो देने जैसा दर्द दे रही है, एक ऐसा गम , जो लंबे समय तक हमें खाता रहेगा।

इसे तो लड़की नहीं, लड़का होना चाहिए था

8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के गोवा में जन्मी आशा भोसले का जन्म संगीतमय परिवार में हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक जाने-माने एक्टर और शास्त्रीय गायक थे। संगीत विरासत में मिला, मगर आशा को संगीत से ज्यादा खेलकूद में रुचि थी। उन्होंने बताया था, 'मेरे पिताजी संगीत के महारथी थे और भाई-बहन भी संगीत प्रेमी। पिताजी मुझे संगीत की तालीम देने की कोशिश करते, मगर मैं तो खेलकूद और घर के कामों में मग्न रहती। हमारे स्कूल में एक मास्टरजी थे। वह जब भी मुझे और दीदी को साथ गाने के लिए कहते, मैं भाग जाती थी। मेरे घरवाले और आस-पड़ोस के लोग मुझे बुद्धू, पठान, पहलवान जैसे नामों से बुलाते थे। मां तो कई बार कहतीं, गलती से मेरे घर में लड़की पैदा हो गई, इसे तो लड़का होना चाहिए था।'

100 रुपए मिले थे पहले गाने के, पति को दिए

शादी के बाद आशा की जिंदगी पहले जैसी कभी नहीं रही। उन्होंने बताया , ' कोई मुझसे कहे कि मैंने गाना कब और कैसे सीखा, तो मैं कहूंगी, गायिका बनने के बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था। मगर घर की खस्ता हालत पर भोसले साहब ने ही मुझे गाने के लिए प्रेरित किया। कई लोग दावा करते हैं कि उन्हें तो हमेशा से पता होता है कि क्या बनना है, मगर मैं ऐसा नहीं कह सकती। मैं तो समय के प्रवाह के साथ बहती चली गई थी। शादी के बाद दिक्कतें बढ़ गई थीं। हम लोग बोरीवली में रहा करते थे, उस जमाने में लक्ष्मी, मिनर्वा, मूवी टोन, फेमस स्टूडियो... ये सभी घर से बहुत दूर थे। आने-जाने में समय भी बहुत जाता और पैसे भी। एकाध गाना मिल भी जाता, तो पैसे मिलने के लाले पड़ जाते। काम पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था।'
'मुझे याद है अपनी पहली कमाई, जो मुझे 'सावन आया सावन आया' के लिए मिली थी और वो थी 100 रुपए। मैंने वो पैसे भोसले साहब के हाथों में रखे थे। उस वक्त तो मैं जरा भी महत्वकांक्षी नहीं थी।' अपनी बुरी शादी में आशा ने जितनी भी प्रताड़ना और अवहेलना सही हो, मगर मातृत्व उनकी जिंदगी में खुशी का चमचमाता नगीना था। उन्होंने बताया था, 'मां बनना मेरी सबसे बड़ी खुशी थी और उस खुशी के बाद मैंने भोसले साहब के दिए हुए सारे दुख माफ कर दिए थे।' सभी जानते हैं कि तनाव और उथल -पुथल माहौल में आशा अपने करियर को सलीकेदार ढंग से आगे नहीं बढ़ा पाईं। एक लंबे समय तक वह टॉक्सिक मैरिज की शिकार रहीं। उन्होंने घरेलू हिंसा भी सही। 1960 के आस-पास वह अपने दो बच्चों और गर्भस्थ शिशु (आनंद) के साथ मायके लौट आईं थीं। मायके और उनके बीच की दूरियां कम हैं।

ओपी नैयर, एसडी बर्मन और पंचम ने भरे सुरों में रंग

सैकड़ों गानों से लोगों के दिलों पर राज करने वाली आशा ने कई संगीतकारों के लिए कालजयी गाने दिए, मगर ओपी नैयर और एसडी बर्मन के साथ उनका जादू सिर चढ़कर बोला। 'नया दौर' (1957) के जरिए इस जोड़ी ने एक इतिहास रच दिया। 'उड़े जब-जब जुल्फें तेरी' और 'मांग के साथ तुम्हारा' जैसे गीतों ने आशा को पहली बार फिल्म की लीड एक्ट्रेस की आवाज बनाया और उन्हें बीआर चोपड़ा जैसे बड़े कैंप का हिस्सा बना दिया। उसी साल (1957) में संगीतकार एसडी बर्मन और लता मंगेशकर के बीच हुए मनमुटाव ने आशा के लिए सफलता के नए दरवाजे खोल दिए। अगले पांच सालों तक जब एसडी बर्मन ने लता के साथ काम नहीं किया, तब आशा उनके कैंप की मुख्य गायिका बनकर उभरीं। सचिन देव बर्मन, किशोर कुमार, आशा भोसले और मजरूह सुल्तानपुरी की चौकड़ी ने हिंदी सिनेमा में रूमानी और चुलबुले गीतों का नया दौर शुरू किया।

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